जीवन हमें चला रहा है या हम इसे चला रहे हैं ?जीवन हम से है या हम जीवन से ?
जीवन की दिशा हम स्वयं तय करते हैं या यह खुद-बखुद,किसी बहती हुई जलधारा के समान, समय के उस ढलान की ओर उन्मुख हो चलता है जो इसके आस-पास होती है ?
ऐसे अनेकों प्रश्न हम सभी के जीवन में कभी न कभी अवश्य उठा करते हैं|क्या ऐसा नहीं कि ऐसे समय में ही आत्म-साक्षात्कार - जिसे शाश्त्र जीवन का उद्देश्य बताते हैं,की संभावनाएं प्रबल होती हैं | तो फिर क्यों नहीं हर कोई अपने जीवन की इन परिस्थितिओं का सदुपयोग कर जीवन की चरम उस संभावना को प्राप्त कर पाता ?
जीवन की विषमताओं का सामना करते हुए ही मानव जाति आज , विज्ञान के उन गूढ़ रहस्यों का पता लगा पा रही है जो उसे जीवित रखने की तमाम आवश्यकताओं की पूर्ती करते हैं | पर क्या इस दौर में मनुष्य अपने वास्तविक रूप का दर्शन कर पाने में पुर्णतः सक्षम हो पाया है ? क्या वह जीवन को उस तरह से जी रहा है जो उसे स्थाई आनंद की ओर ले जाए ?
इस प्रश्न का उत्तर बाहर से पा भी लिया जाए तो उस का महत्व उतना ही रहेगा जितना किसी आम के उद्यान में जाकर आमों के पेड़ों सही-सही संख्या करके इस भांति लौट आना मानो न जाने कितने मीठे आम खाकर लौट आये हों |
परन्तु वह स्वयं के साथ एक प्रकार का धोखा ही हुआ | यदि उस उत्तर में स्वयं की कोई अनुभूति न हो , स्वयं में कोई डूब न हो तो वह उत्तर एक प्रकार का भटकाव ही है ,जो आज के समय में अधिकाँश लोगों के जीवन में प्रवेश कर रहा है | तो ऐसे समय में हम किस प्रकार जीवन के उद्देश्य की ओर सही प्रकार से अग्रसर हों ?
इसी प्रश्न के उत्तर की ओर जाने के प्रयास मैं अपने जीवन में कर रहा हूँ और प्रौद्योगिकी के वरदान का इस्तेमाल कर अपने समकालीन मनुष्यों के इस ओर होने वाले प्रयासों को जान ने की अभिलाषा से इस ब्लॉग का आरम्भ कर रहा हूँ |
जीवन की दिशा हम स्वयं तय करते हैं या यह खुद-बखुद,किसी बहती हुई जलधारा के समान, समय के उस ढलान की ओर उन्मुख हो चलता है जो इसके आस-पास होती है ?
ऐसे अनेकों प्रश्न हम सभी के जीवन में कभी न कभी अवश्य उठा करते हैं|क्या ऐसा नहीं कि ऐसे समय में ही आत्म-साक्षात्कार - जिसे शाश्त्र जीवन का उद्देश्य बताते हैं,की संभावनाएं प्रबल होती हैं | तो फिर क्यों नहीं हर कोई अपने जीवन की इन परिस्थितिओं का सदुपयोग कर जीवन की चरम उस संभावना को प्राप्त कर पाता ?
जीवन की विषमताओं का सामना करते हुए ही मानव जाति आज , विज्ञान के उन गूढ़ रहस्यों का पता लगा पा रही है जो उसे जीवित रखने की तमाम आवश्यकताओं की पूर्ती करते हैं | पर क्या इस दौर में मनुष्य अपने वास्तविक रूप का दर्शन कर पाने में पुर्णतः सक्षम हो पाया है ? क्या वह जीवन को उस तरह से जी रहा है जो उसे स्थाई आनंद की ओर ले जाए ?
इस प्रश्न का उत्तर बाहर से पा भी लिया जाए तो उस का महत्व उतना ही रहेगा जितना किसी आम के उद्यान में जाकर आमों के पेड़ों सही-सही संख्या करके इस भांति लौट आना मानो न जाने कितने मीठे आम खाकर लौट आये हों |
परन्तु वह स्वयं के साथ एक प्रकार का धोखा ही हुआ | यदि उस उत्तर में स्वयं की कोई अनुभूति न हो , स्वयं में कोई डूब न हो तो वह उत्तर एक प्रकार का भटकाव ही है ,जो आज के समय में अधिकाँश लोगों के जीवन में प्रवेश कर रहा है | तो ऐसे समय में हम किस प्रकार जीवन के उद्देश्य की ओर सही प्रकार से अग्रसर हों ?
इसी प्रश्न के उत्तर की ओर जाने के प्रयास मैं अपने जीवन में कर रहा हूँ और प्रौद्योगिकी के वरदान का इस्तेमाल कर अपने समकालीन मनुष्यों के इस ओर होने वाले प्रयासों को जान ने की अभिलाषा से इस ब्लॉग का आरम्भ कर रहा हूँ |
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